See the world through my eyes….

Latest

क्यों हमारे देश के 71 प्रतिशत बुजुर्ग को काम करना पड़ता है?

Image
यूनाइटेड नेशनल पापूलेशन फंड इंडिया के एक सर्वे से यह बात सामने आई है की भारत में 60 से 80 तक की उम्र वाले करीब 71 प्रतिशत बुजुर्ग काम करने के लिए  मजबूर है इस सर्वे को कई सगढ़नो ने अंजाम दिया था इसमें देखा गया की 71 प्रतिशत बुजुर्ग आर्थिक जरूरते पूरी करने के लिए काम करते है न कि अपनी इच्छा से यह भी देखा गया है कि काम में मौजूदा भागीदारी , गरीबी और निक्षरता के बीच करीबी रिश्ता है यह सर्वे केरल तमिलनाडु , महाराष्ट्रा ,ओड़िशा ,पश्चिम  बंगाल ,पंजाब और  हिमाचलप्रदेश ,में किया गया यहाँ पर आबादी का बड़ा हिस्सा बुजुर्ग है यह सर्वे कई बातो को ध्यान में रख कर किया गया है  जैसे की लोगो की सामाजिक – आर्थिक हेसियत ,काम में भागीदारी और फायदों इनकम और मालिकाना सम्पति रहने के इतजाम हेल्थ अवस्था,  हेल्थ सुरक्षा ,और सामाजिक सुरक्षा के प्रति जागरूकता है सर्वे से पता चला की बुजुर्ग पुरुषो की काम में भागीदारी 39  प्रतिशत है वही महिलायों की 11  प्रतिशत है इनमे से ज्यादातर की उम्र 60 से 69  प्रतिशत  के बीच में  है वही 80 या इसे अधिक उम्र वाले बुजुर्गो में काम करने की भागीदारी के मामले में पुरुषो का प्रतिशत 13 है जबकि महिलायों का प्रतिशत 3 है हलाकि महिलायों की काम में भागीदारी कम देखी गयी है
अभी तक 84 फीसदी लोगो को  किसी भी सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिलता है केरल और हिमाचल प्रदेश में केबल अठारह प्रतिशत लोगो को पेंशन मिलता है, जबकि तमिलनाडु, और  महाराष्ट्र, ओडिशा में  केवल चार प्रतिशत लोगो को मिलता है इससे पता चलता है की 70 प्रतिशत लोगो को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना , (प्ळछव्।च्ै) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (प्ळछॅच्ै) के बारे में जानते है पर केवल  40 प्रतिशत लोग ही अन्नपूर्णा योजना के बारे में जानते है यूएनएफपीए के एक सर्वेक्षण के अनुसार 2050 तक हमारे देश में  बूजुर्गो की संख्या लगभग 315 लाख छूने की उम्मीद है.हालाकि काम की भागीदारी महिलायों के बीच काफी कम देखी गयी है क्योंकि महिलाए घर के काम में अपना योगदान करती है जबकि दूसरी तरफ  पुरुष लोग बाहर का काम  करते है जिनमे से 70 प्रतिशत लोग खुद की जरूरतों को पूरा करने के लिए करते है और नौ प्रतिशत लोग घर के आय को पूरा करने के लिए काम करते है
आज कल ज्यादा  तर बुजुर्गो को काम इसलिए करना पड़ता है क्योंकि आज कल हमारे देश में बुजुर्गो की अहमियत घट गयी है आज की युवा पीढ़ी सिर्फ खुद के बारे में सोचती है उन्हें कोई  फर्क नही पड़ता है की उनके माँ बाप क्या कर रहे है क्या खा रहे है और कैसे रह रहे है इसलिए अधिकतर बुजुर्ग को खुद के खाने और रहने के लिए 60 साल के बाद भी काम करना पड़ता है और दूसरा कारण यह है कि सरकार की पेंशन योजना इतनी अच्छी नही है की लोग सेवानिवृत्ति होने के बाद अपनी जरूरतों को पूरा नही कर सकते है इसलिए सरकार को चाहिए की वो बुजुर्ग के लिए अच्छी योजना निकाले जिससे आने वाले सालो में हमारे बुजुर्ग को अच्छी सुविधा मिल सके और 60 के बाद लोगो को काम न करना पडे
भारत में हर 10 बुजुर्ग जोडे  में से 6 जोड़े  मजबूर है अपने ही घर से बाहर रहने के लिए क्योंकि हमारे बुजुर्ग को वो प्यार नही मिल पा रहा है जो उन्हें अपने बच्चो से मिलना चाहिए उनके पास रहने के लिए घर नही है इसलिए आज कल बुजुर्गो को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड रहा है और जो लोग वृद्धाश्रम नही जाना चाहते है उन्हें मज़बूरी में काम कर के अपना घर चलाना पड़ रहा है
वही दूसरी तरफ माँ बाप जैसे जैसे बूढ़े होते जाते है वो अपनी सारी जमीन और जायदाद अपने बच्चो के नाम कर देते है जिसके कारण उन्हें अपना सब कुछ खोना पड़ता है . भारत में बुजुर्ग कि  आबादी लगातार बढ़ रही है और साथ में  इन लोगों कि  समस्याओं भी बढ़ रही हैं. वृद्धाश्रम में लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह भी माता पिता के अधिकांश अब अपने बच्चों के साथ रहने के बजाय वृद्धाश्रम में रहने का फैसला कर रहे हैं.
हम हमारे समाज में देख रहे हैं क्या है कि बच्चों को उनके माता – पिता की देखभाल के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं, वे उन पर पैसा खर्च नहीं करना चाहते, वे एलियंस के रूप में उनके माता – पिता का इलाज कर रहे हैं, वे एक भावनात्मक बंधन को साझा नहीं करना चाहते माता – पिता के साथ. इन बच्चों को भूल रहे हैं कि उनके जीवन की नींव के माता – पिता के द्वारा बनाया गया है. वे अपने माता – पिता के प्रति अपने नैतिक और नैतिक कर्तव्य को भूल रहे हैं. यह तेजी से जीवन, औद्योगीकरण, पैसा उन्मुख मन, मुद्रास्फीति आदि बच्चे अपने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से और इस स्थिति का एक परिणाम के रूप में बड़ों उपेक्षित हो रहे हैं
अगर हमे अपने देश से बुजुर्गो को काम करने से रोकना है तो इसके लिए हमे कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होगे। जिससे हमारे देश के बुजुर्ग सेवानिवृत्ति होने के बाद आराम की जिंदगी जी सके उन्हें अपने बुढ़ापे में किसी की सहारे की जरुरत न पडे बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना
जीवन की सुरक्षा और वृद्ध व्यक्तियों की संपत्ति के लिए एक उपयुक्त तंत्र के संस्थानीकरण
हर जिले में वृद्धाश्रम की स्थापना
Advertisements

मंहगाई और आम आदमी

 

पिछले दो वर्षों में हमारे देश के किसानो की हालत और भी ख़राब हो गयी है जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा हुआ है । सभी देशो में आर्थिक-सामाजिक हालात में सुधार का नाम ही वास्तविक विकास है।जबकि हमारे देश में एक वर्ग के अमीर बनते जा रही है और गरीब गरीब होता जा रहा है क्या हम इसे विकास का नाम दे सकते है
सरकारी आंकड़े खुद ही बयान करते हैं कि पिछले वर्ष के दौरान खाने-पीने की वस्तुओं के दाम 16.5 की दर से बढ़े हैं। चीनी के दाम 73 फीसदी, मूंग दाल की कीमत 113 फीसद, उड़द दाल के दाम 71 फीसदी अनाज के दाम 20 फीसद, अरहर दाल की कीमत 58 फीसद और आलू-प्याज के दाम 32 फीसदी बढ़ गए हैं।
प्रधानमंत्री एक ऐसी अर्थनीति के निर्माता बन चुके हैं, जो अमीर कॉर्पोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई है। इस अर्थनीति के कारण आम आदमी की जिंदगी दुश्वार गई है। पिछले दो वर्षों से जारी महंगाई दर ने पिछले सभी रिकार्ड तोड़ दिए है । अमीर आदमी को यकीनन महंगाई से कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, किंतु एक गरीब इंसान की हालत कितनी बदतर हो चली है, इसका अंदाजा शासक वर्ग को नहीं है।
डीजल और रसोई गैस के दामों में इजाफा, पहले से सुलग रही महंगाई की अग्नि को और अधिक प्रज्वलित करने के काम को अंजाम दे रहा है । पेट्रोलियम कंपनियों के नुकसान की भरपाई करने के नाम पर पहले पेट्रोल के दाम में और अब डीजल व रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी की गई। तेल कंपनियों के आंकड़े कुछ और ही बयान करते हैं।
पिछले वर्ष ओएनजीसी ने तकरीबन 20 हजार करोड़ इंडियन ऑइल ने 3 हजार करोड़ और जीएआईएल ने 3 हजार करोड़ रुपयों का शुद्ध मुनाफा अर्जित किया। भारत के प्रधानमंत्री को एक बेहद काबिल अर्थशास्त्री करार दिया जाता है। क्या फायदा है प्रधानमंत्री की ऐसी काबिलियत का जो आम भारतीय की रोजमर्रा की परेशानियों को दूर करने के स्थान पर उसमें बढ़ोतरी ही करती जा रही हो।
वही दूसरी तरफ यूरिया के दाम भी पिछले कुछ सालो में पांच गुना बढे है । सीएनबीसी आवाज को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक सरकार ने यूरिया की कीमत तय करने का ये नया फॉर्मूला बनाया है जिससे सब्सिडी में कटौती और फर्टिलाइजर कंपनियों की माली हालत सुधारने में मदद मिलेगी।सूत्रों का कहना है कि सरकार की यूरिया की कीमत को महंगाई दर से जोड़ने की योजना है जिससे महंगाई दर बढ़ने के साथ यूरिया के दाम बढ़ जाएंगे। यूरिया की कीमत में तय लागत का हिस्सा महंगाई दर से जोड़ दिया जाएगा। अभी यूरिया की कीमत में तय लागत 1,000 रुपये प्रति टन है।दरअसल केलकर कमिटी ने यूरिया के दाम महंगाई दर से जोड़ने की सिफारिश की थी।
सरकार यह दावा करती आ रही है की महगाई पर काबू पा लिया जाएगा पर नतीजा हमारे सामने है काले बाजार और काले अघोषित गोदामों में किसान को चावल, चीनी, दाल, गेहूं आदि के जखीरे को दबाकर बाजार में चालू आपूर्ति कम कर दी गई। एक ओर जहा हमारे गोदामों में अनाज सड रहे है वही दूसरी ओर हमारे देश की जनता भुखी मर रही है बिचैलिए मालामाल हो रहे हैं और किसान बदहाल हैं।
वही दूसरी तरफ पेट्रोल के दाम भी आसामन छु रहे है पेट्रोल के दाम में 30 पैसे प्रति लीटर और डीजल में 18 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि हुई है आम जनता पर यह बढ़ोतरी का बोझ पेट्रोल पंप डीलरों के कमीशन में इजाफा होने की वजह से पड़ा है। कीमतों में बढ़ोतरी पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से अधिसूचना जारी होने के बाद ही होगी। पिछले महीने सरकार ने रसोई गैस एजेंसियों के कमीशन में भी वृद्धि कर दी थी जिससे एलपीजी सिलेंडर 11.42 रुपये महंगा हो गया था।पेट्रोल पंप डीलरों के एसोसिएशन की तरफ से दी गई सूचना के मुताबिक सरकार ने कमीशन बढ़ाने की उनकी मांग आंशिक तौर पर स्वीकार कर ली है। पेट्रोल पर कमीशन 1.499 रुपये प्रति लीटर से बढ़ा कर 1.799 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इससे दिल्ली में इसकी कीमत 67.90 रुपये से बढ़कर 68.20 रुपये प्रति लीटर हो जाएगी। डीजल पर कमीशन 91 पैसे प्रति लीटर के बजाय अब 1.09 रुपये प्रति लीटर होगा। दिल्ली में अब यह 47.13 रुपये प्रति लीटर मिलेगा।
किराये पर सर्विस टैक्स लागू करने के बाद रेलवे ने खान-पान भी महंगा कर दिया है।
रेलवे बोर्ड ने 1अक्टूबर से खाद्य पदार्थो के दाम बढ़ा दिए हैं, लेकिन सर्कुलर 21 अक्टूबर को जारी किया। यह बात अलग है कि स्टेशन प्लेटफॉर्म हो या ट्रेन, सभी जगह खाने की क्वालिटी में गिरावट आई है। कंपनी और ठेकेदारों का हमेशा तर्क रहता था कि महंगाई बढ़ने के बावजूद खान-पान के दाम नहीं बढ़ाए गए। इसी का परिणाम रहा कि रेलवे ने गुपचुप नाश्ता, भोजन के दाम में वृद्धि कर दी। आप ट्रेन में खाना खाएंगे तो यह स्टेशन के मुकाबले महंगा मिलेगा। नई सूची के मुताबिक स्टेशन पर 15 रुपये में मिलने वाले दो समोसे ट्रेन में 18 रुपये में मिलेंगे।
अगर हमारे देश में महगाई का साया ऐसे ही मडराता रहा तो शायद वो दिन दूर नही है जब हमारे देश के किसानो और आम आदमी के घर में ही खाने के लिए अनाज नही होगे गाड़ी है पर उसे चलाने के लिए पेट्रोल नही है

पंचायत की मार सिर्फ औरत पर ही क्यों पड़ती है

पिछले कुछ सालो से हम सब ने  खाप पंचायत का बहुत नाम सुना है पर यह खाप पंचायत है क्या ? खाप पंचायत के लोगो का कहना है की अगर कोई  लड़का या लड़की एक ही गाँव के है और उनका गोत्र भी एक है तो वो शादी नही कर सकते है क्योंकी वो दोनों भाई बहन है जबकि हमारे सविधान में ऐसा कुछ नही लिखा है हम किसी को भाई या बहन तब मानते है जब वो हमारे रिश्तेदार हो या उसे हमारा खून का रिश्ता हो। जबकि खाप के लोगो का कहना है की एक ही गाँव में रहे वाले लोग भाई बहन है उन दोनों के बीच प्यार या शादी का रिश्ता नही हो सकता है। इसेको मद्देनज़र  रखते हुए हरियाणा की सर्व खापों ने 2010 में सरकार  से हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन की मांग की है।
खाप पंचायत ने सर्वसम्मति से  प्रस्ताव पारित किया की एक ही गाँव में एक ही गोत्र में किया गया विवाह अवैध घोषित किया जाए। और साथ में ही खाप प्रतिनिधियों ने सामाजिक परंपराओं और रीति रिवाजों का हवाला भी दिया। और कहा कि आधुनिकता के नाम पर युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट हो रही है और सामाजिक ताने-बाने को खराब कर रही है। सर्व खाप पंचायत का प्रतिनिधिमंडल अपनी मांग के समर्थन में 5 नवंबर को दिल्ली में राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और केंद्र कानून मंत्री को ज्ञापन सौंपेगे ।
अभी कुछ साल पहले मनोज और बबली के केस सामने आये थे जिसे दोनों को खाप पंचायत मौत की सजा सुनाई थी . इन दोनों ने परिवार और समाज के खिलाफ जा कर शादी की थी जिसकी सजा इन्हें मिली। इस केस में 2010 में 5 लोगो को सजा मिली पर क्या सिर्फ सजा मिलने से हमारे समाज से  खाप पंचायत का डर ख़त्म हो जाएगा। जो लोग खाप के नाम पर लोगो का ख़ून बहा रहे है वो रुकेगा कब रुकेगे या रुकेगे भी या नही कुछ कहा नही जा सकता वहीं, गठवाला खाप के अध्यक्ष बलजीत मलिक ने कहा कि एक ही गोत्र, एक ही गांव और आसपास के गांवों में शादी को अवैध व अमान्य घोषित किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि खापों को बेवजह ही बदनाम किया जा रहा है। आज तक किसी भी खाप पंचायत ने ऑनर कीलिंग नहीं करवाई है। खाप तो इस प्रकार के निर्णयों का विरोध करती हैं।
अभी कुछ दिनों से हरियाणा में लगातार हो रहे रेप और गैंगरेप के मामले पर पूर्व मुख्यएमंत्री ओमप्रकाश चैटाला ने खाप पंयायतों के बयान से मिलता जुलता विवादास्प द बयान दिया है । बयान में उन्हों ने कहा कि रेप जैसी वारदातों से लड़कियों को बचाने के लिए उनकी शादी कम उम्र में कर देनी चाहिए। इससे पहले हरियाणा के खाप पंचायत ने एक अनोखा उपाय सुझाते हुए कहा था कि विवाह के उम्र में कमी करके ऐसा अपराधों पर काबू पाया जा सकता है।  पिछले एक महीने के अंदर बलात्कार के 16 मामले हो चुके है। जिसमें कई ऐसे मामले हैं, जो बेहद ही दर्दनाक हैं
खाप के एक सदस्य  ने कहा था कि बच्चेक जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनकी यौन इच्छा ओं में भी बढ़ोत्तएरी होती है। जब यह इच्छाच पूरी नहीं होती तो वह भटकने लगते हैं, और फिर ऐसे अपराधों को अंजाम दिया जाता हैं। इस कारण से शादी की कोई न्यूनतम उम्र नहीं होनी चाहिए। क्या कम उम्र में शादी करने से रेप जैसे केस नही होगे अगर ऐसा है तो रेप उन महिलायों का क्यों होता है जो शादी- सुदा  होती है या उन बच्ची हा जो सिर्फ 2 या 3 साल की है उनका क्या कसूर होता है
वही दूसरी तरफ 18 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश के लिलोन गांव में हुई एक आठ गाँव के बैठक में पंचायत ने एक बार फिर लडकियों पर फतबा जरी करते हुए कहा की लडकियों को अगर  छेड़छाड़ की घटनाओं से बचाना है तो वो ढंग के कपडे पहने और उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में खाप पंचायत के फैसले के बाद अब शामली के लिलोन गांव में एक पंचायत ने अपना फरमान सुनाते हुए लड़कियों के जींस और टॉप पहनकर बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी है।और साथ में लडकियों को मोबाइल रखने पर भी पाबंदी लगा दी। पंचायत में इस बात पर भी सहमति जतायी गयी कि यदि किसी घर की लड़की पंचायत के निर्देशों का उल्लंघन करती है तो उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा। पंचायत ने लड़कियों के पहनावे पर नजर रखने के लिए जगह-जगह लोगों को तैनात किया है, जो इसकी जानकारी देंगे।
हमे आजाद हुए 65 साल हो गए है पर क्या इस देश की औरते और लडकियों को पूरी तरह से आज़ादी मिल पाई है

भूमि अधिग्रहण कानून किसके लिए?

पिछले कुछ वर्षों से देश के कई हिस्सों में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन हुए हैं.
दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल गाँवों में अपनी जमीनें बचाने के लिए शांतिपूर्ण धरना दे रहे किसानों पर 2011 में हुई पुलिस गोलीबारी के बाद से जमीन का मामला राष्ट्रीय स्तर पर छा गया.
काँग्रेस महासचिव राहुल गाँधी ने भट्टा-पारसौल से पदयात्रा की और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों से संवाद कायम किया, हालाँकि काँग्रेस पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में इसका बहुत फायदा नहीं हुआ
वामपंथी राज में सिंगुर और नंदीग्राम का नजारा पुराना नहीं है। न ही  नवी  मुंबई के बेदखल गांवों की कहानी पुरानी है।और अब पिछले कुछ दिनों से उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियामा के गांवों में हमे किसानो में आक्रोस की भावना देखने को मिल रही है  हलाकि यहाँ पर खून खराबा तो नही हुआ है पर  भूमि अधिग्रहण के पीछे की कहानी बहुत ही दर्दनिये है । इंफ्रास्ट्रक्चर, सेज, इंड्सट्रीयल कारीडोर, मेगा सिटी और एनएसआईजेड के लिए जमीन अधिग्रहण के पैमाने बदल देने की छूट राज्य सरकारों को मिल ही रही है।
राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे चुनिंदा मामलों में ही सरकार जबरन जमीन अधिग्रहण करेगी।रेलवे, पोर्ट, सड़क और नहरों के लिए जमीन लेने पर लोगों की राय लेना जरूरी नहीं होगा। लेकिन, 100 एकड़ से ज्यादा जमीन लेने पर 80 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी होगी। नए कानून की हर 20 साल पर समीक्षा का प्रस्ताव है।ताकतवर लोग कैसे कानून की धज्जियां उड़ाकर जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था
ग्रामीण विकास मंत्री के मुताबिक ड्राफ्ट के तहत जमीन बेचने लिए 3 में से 2 मालिकों की सहमति लेना जरूरी होगा बीजेपी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा कि पार्टी किसानों के हितों की रक्षा करने की पक्षधर है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि देश का विकास जारी रहे। इसलिए पहले हम इस बिल के अंतिम स्वूरूप को देखना चाहते हैं और इसके बाद ही कोई ठोस प्रतिक्रिया देंगे।
उधर, कांग्रेस ने मंत्रियों के एक समूह द्वारा भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसौदे को मंजूरी दिये जाने का स्वागत किया और कहा कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद किसानों और खासकर गरीब किसानों को फायदा होगा।
कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने यहां कि कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में भूमि अधिग्रहण और भूमि सुधार के बारे में सौ साल पुराने कानून के स्थान पर एक नया कानून देश को देने का वादा किया था। सरकार इस वादे को लागू करने जा रही है। अल्वी ने कहा कि इस नए कानून से किसानों और खासकर गरीब किसानों को फायदा पहुंचेगा।

नए जमीन अधिग्रहण कानून के तहत प्रस्ताव है कि पब्लिक प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए कानून सख्त किए जाएंगे। पीपीपी प्रोजेक्ट में कंपनी के 90 फीसदी जमीन खरीदने के बाद ही सरकार का दखल होगा।मौजूदा जमीन अधिग्रहण पर भी मुआवजा नए कानून के तहत तय किया जाएगा। गांवों में जमीन के बाजार भाव का 4 गुना मुआवजा दिए जाने का प्रस्ताव है। शहरों में जमीन के बाजार भाव का 2 गुना मुआवजा देने का प्रस्ताव है।नए कानून के तहत हर विस्थापित को 5 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा। साथ ही , विस्थापित परिवार को 20 साल तक 3000 रुपये प्रति महीना मुआवजा मिलेगा।जमीन अधिग्रहण बिल के तहत जमीन के मालिक को 20 फीसदी जमीन डेवलप करके वापस करनी होगी। जमीन का मालिकाना हक ट्रांसफर होने पर 10 साल तक मूल मालिक को मुनाफे का 20 फीसदी मिलेगा। इन दोनों मामलों से जाहिर है कि जब समर्थ लोगों के सवाळ उठाने पर जान पर बन आती है तो निहत्था आम आदमी अगर भूमि अधिग्रहण के लिए सहमत न हो , तो उसकी क्या गत हो सकती है।
इन सब में सबसे अहम बात यह है की कृषि से गैर कृषि कार्यों में जमीन का हस्तानांतरण बिल्कुल निषिद्ध हो। पर्यावरण रक्षण को देखते हुए हमने जिस तरह इसकृषि से गैर कृषि कार्यों में जमीन का हस्तानांतरण बिल्कुल निषिद्ध हो। पर्यावरण रक्षण को देखते हुए हमने जिस तरह इस कृषि से गैर कृषि कार्यों में जमी बात पर सैद्धांतिक सहमति बनाई है कि कुल भूमि का एक तिहाई हिस्सा वनों के लिए
आरक्षित होना चाहिए उसी तरह इस बात पर भी सैद्धांतिक सहमति बननी चाहिए कि ज्यादातर भूमि को अनाज उत्पादन के कार्यों में ही उपयोग में लाया जाना चाहिए। इस संबंध में एक बड़ी जरूरत ग्राम सभाओं के अधिकार से जुड़ी है। ग्राम सभाओं को यह संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी सहमति के बगैर किसी भी तरह की भूमि अधिग्रहित न की जाए। अभी देश में करीब छह लाख गांव हैं और हमारा देश ग्रामीण पृष्ठभूमि का खेतीहर देश है, इसलिए किसी भी तरह के अधिग्रहण में गांवों की सहमति को अनिवार्य कर देना हमारी आवश्यकता है फिर जिस भी जमीन का अधिग्रहण हो, उसमें इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाए कि किस तरह सबसे कम विस्थापन हो। साथ ही पर्यावरण को भी कैसे कम से कम नुकसान पहुंचे।
न्यूनतम स्तर पर नहीं होगा तब तक सही तौर पर पुनर्वास की व्यवस्था भी नहीं हो पाएगी फिर नए मसौदे में पुनर्वास की स्पष्ट और न्यायपूर्ण व्याख्या भी जरूरी है, जो अपना घर-बार और जमीन खो रहे हैं, उन्हें केवल कुछ पैसे और कहीं दूर दो कमरे का एक आवास दे देना भर पुनर्वास नहीं है। विस्थापन में जिन परिवारों ने अपनी अधिकांश विरासत खो दी, उन्हें जीविका का जरिया अनिवार्य तौर पर मिलना ही चाहिए। आखिर हम एक आजाद देश के वासी हैं और भूमि अधिग्रहण पर राज्य की सार्वभौमिक सत्ता का वह रूप हमें स्वीकार्य नहीं हो सकता जो गुलामी के दौर में था। रोजगार और विकास के नाम पर बरगलाने का खेल हमारे साथ अब और नहीं खेला जा सकता है।सरकार को चाहिए कि वह अब विकास के प्रति सही समझ पैदा करे। एकांगी विकास से किसी देश का भला नहीं हो सकता। केवल अरबपति पैदा करना समृद्धि का लक्षण नहीं है।

केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने विवादास्पद भूमि अधिग्रहण कानून के अंतिम मसौदे को हरी झंडी दे दी है. केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में हुई मंत्रियों के समूह की बैठक में ये फैसला किया गया है. अब इस मसौदे को मंत्रिमंडल में भेजा जाएगा बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए शरद पवार ने कहा, हमने विधेयक का अंतिम मसौदा तैयार कर लिया है, लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून जिस रूप में अब पेश किया जा रहा है उसे लेकर किसानों और किसान संगठनों में कई आशंकाएँ पैदा हो गई हैं. पिछले साल तैयार किए गए मसौदे की कई धाराओं को नए मसौदे से या तो पूरी तरह हटा दिया गया है या फिर उन्हें बहुत हद तक कमजोर कर दिया गया है
विधेयक के पुराने मसौदे में कहा गया था कि ऐसी जमीनों को अधिग्रहीत नहीं किया जाएगा जिसमें कई फसलें उगाई जाती हों, पर नए मसौदे में इसे बदल दिया गया है और कहा गया है कि श्श्खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसी जमीनों को आखिरी स्थिति में ही अधिग्रहीत किया जाएगा जिसमें कई फसलें होती हैं.

Chath Pooja

This slideshow requires JavaScript.

Purana Qila (Old Fort) in Delhi

This slideshow requires JavaScript.